गुरुवार, 30 अप्रैल 2015

story of a innocent girl

 आज एक पुरानी कहानी याद आ गई   एक लड़की की कहानी  जो अपनी आँखों में हज़ारो सपने लिए  अपनेघर से सैकड़ो किलो मीटर  दूर आई थी ताकि उच्च शिक्षा पाकर  माता पिता का नाम रोशन कर सके मेरी  मुलाक़ात उससे हॉस्टल में हुई   थी  .
वो मेरे सामने वाले रूम में थी और हॉस्टल में पहले दिन से ही हमारी दोस्ती भी हो  गई थी काफी खुशमिज़ाज और हेल्पफुल  थी  वो  पी एच   डी  करके नाम कमाना चाहती   थी इसलिए अक्सर रात को देर तक लाइब्रेरी   या
इंटरनेट पर  रिसर्च क रती रहती और अक्सर देर से आने पर वार्डन मेम की डांट भी सुनती  थी  एक दिन वो काफी  लेट हो गई सबने सोचा की  वो  वैसे भी देर से  ही आती थी wतो  आ जाएँगी पर जब डिनरके टाइम तक उनकी कोई खबर  नहीं आई  तो वार्डन मेम ने  हॉस्टल की अन्य लड़कियों से  पूछताछ शुरू की और साथ   साथ अच्छी डाँट भी पिलाई  सब लडकिया उन्हें कोस रही थी की उनकी
वजह से सब को डांट  सुनना पड़ी  पर जब  काफी देर तक उनकी कोई खबर नहीं  आई तो सब को फिक्र होने लगी तभी अचानक मेम ने सब को बुलाया और कहा की उनका पता चल गया है वो हॉस्पिटल में है और उनके साथ कुछ ऐसा हुआ हुआ है जो ठीक नहीं है साथ ही bहम लोगो को उनसे ना मिलने जाने की हिदायत भी दी गई मेम ने उन्हें काफी भलाबुरा भी कहा और उनके साथ जो कुछ भी हुआ उसका  सारा दोष उनको ही दिया   हम सब काफी घबरा गए थे  सब लोग अपने हिसाब  से अंदाजा लगा रहे थे की क्या हुआ  होगा पर कोई भी उस वक़्त उनके पास जाने की हिम्मत नहीं कर पा रहा था जबकि उस वक़्त उन्हें साथ की  सबसे    ज़्यादा ज़रूरत थी पर कोई हिम्मत नहीं कर पाया  आखिर उनके डिपार्टमेंट की एक सीनियर दीदी ने उनसे मिलने जाने का फैसला किया
उस रात किसी को भी नींद आई जब सुबह दीदी वापस आई और  उन्होंने बताया  की वो अभी भी  बेहोश है  और  उनकी हालत काफी सीरियस है उनके मम्मी  पापा को खबर दे दी गई है फिलहाल उनके लोकल गार्जियन अंकल उनके पास पास है तभी  हॉस्टल में  कुछ  पुलिस वाले आये और हम लोगो से उनके बारे में  पूछताछ  करने  लगे पर हमको तो पहले ही कुछ न बोलने के निर्देश निर्देश मिल चुके थे  और   मेम ने भी  कहा की वो गाडी   चलाना  सीख रही थी और गिर गई
पर जब अगले दिन हम अपनी अपनी क्लास  के  लिए   जा रहे   थे तो पास की झाड़ियो में उनका बेग पड़ा दिखा थोड़ा आगे एक दुपट्टा भी झाड़ियो में उलझा दिखा  ये निशाँ अपनी कहानी  आप बया कर रहे थे और हमे डरा रहे थे  हम सब दीदी के वापस  आने का इंतेजार कर रहे थे जब दीदी वापस आई तो उनको देख कर पहचानना मुशकिल था सूूजा हुआ चहरा बाहर को निकली आंखे और गले पर पडे निशान उनकी तकलीफ बया कर रहे थे पर यह तो ठीक होने वाले ज़खम थे पर जो चोट दिल पर लगी थी वो तो सारी उमर दुख देने वाली थी   उस पर एक और चोट यह कि मैम ने होसटल छोडने का आदेश दे दिया  जब हम लोग उनसे मिलने गए तो नम आंखो से अपनी दुख की कहानी हमे सुनाई 
वो शाम को जब वापस आ रही थी तो उनको लगा कि कोईउनका पीछा कर रहा है पीछे देखा तो एक साया सा नज़र आया जो तेज़ी से उनकी ओर आ रहा था वो ओर तेज़ कदमो से चलने लगी पर अचानक किसी ने उनपर वार किया और सुनसान राह पर झाड़ियो मे खींच लिया उसने पूरी ताकत से उनका गला दबा रखा था यहा तक कि वो चीख भी नही पाई  और बेहोश हो गई जब होश आया तो खुद को  झाड़ियो मे पड़ा पाया डर और तकलीफ से जूझते हुए बेबस सी बदहवास दौड़ती हुई पास मे रहने वाले अपनेअंकल के घर दौड़ी और फिर बेहोश हो गई और जब होश आया तो खुद को असपताल मे पाया 
उस दिन उनको अपने लड़की होने पर अफसोस हो रहा था उनके पापा उनको वापस ले जा रहे थे उनके सारे सपने आंसू बनके बह रहे थे हम सब दुखी थे पर मजबूर थे सब को पता था कि यह गलत है पर सब चुप थे  
आज इतने साल बाद भी दिल मे कही टीस सी होती है कि काश हम कुछ कर पाते

गुरुवार, 9 अप्रैल 2015

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शुक्रवार, 3 अप्रैल 2015

pehli mulaakaat meri dost ke sath

अगर मैं सुन्दर  न होती ?

सोचिये अगर मैं सुन्दर न होती तो क्या होता होता ?
तो मेरी बेस्ट फ्रेंड मेरी  दोस्त  न होती।  
है न मज़ेदार बात।  
तो हुआ   कुछ यूँ  की  यूनिवर्सिटी हॉस्टल में मेरा पहला दिन था और मैं सारा दिन की आपाधापी  के  बाद शाम  को मैं डिनर की घंटी का इंतज़ार  कर रही थी।
 मैं वहां किसी को जानती नहीं थी तो बाहर जाने से घबरा रही थी की कहीं
किसी सीनियर से न टकरा जाऊं। तभी मुझे लगा की कोई मुझे   बुला रहा है मैंने
बाहर निकल कर देखा तो हलके हरे रंग का सूट पहने एक  छोटी सी मोटी  सी लड़की मुझे  बुला रही थी वो तेज़ी से मेरे पास आई और बोली तुम क़ैसर हो न ?
मैंने कहा हां तो उसने बताया की वो मेरी क्लासमेट है। उसके बाद वो धपाक  पलंग पे लेट गई और जो पहली बात उसने बोली वो  यह थी
अच्छा हुआ भगवान की तुम सुन्दर हो वर्ना मैं तो   डर  रही थी की कहीं कोई काली सी गन्दी सी लड़की हुई तो मैं उसके साथ  कैसे रहूंगी।
मुझे तब उसकी यह बात बहुत बुरी लगी।
पर फिर मुझे लगा की वो बहुत मिलनसार और
मज़ेदार  लड़की है।  और फिर हम दोस्त बन गए  और ये दोस्ती आज भी कायम है और मुझे ख़ुशी है की हॉस्टल में हर तरह के दोस्त मिलनेसे सुंदरता को लेकर उसकी सोच भी बदल गई।
अब एक सवाल मेरे दोस्तों के लिए बताओ वो कोन  है ?

रविवार, 29 मार्च 2015

छोटी सी जीत

छोटी सी जीत


आनंदी ने अपने पति को काम में  उलझे देख कर पूछा की क्या मैं कुछ मदद करू ।  जवाब में हर बार की तरह एक रूखा सा उत्तर मिला तुम अपने किचन के काम देखो ये सब समझने की ज़रूरत नहीं है. और एकबार   फिर

यूनिवर्सिटी  की प्रथम श्रेढ़ी  से   पास आनंदी  मुँह नीचे कर काम करने लगी पर आँख के कोने
न जाने क्यों भीग गए।   तभी उनका बेटा स्कूलसे वापस आया वोकाफी  परेशान  था  पापा ने  बेटे को  परेशान  देख कर कहा  क्या हुआ बेटा  बेटा बोला प्रोजेक्ट बनाना है।  पापा  ने  कहा मैं कुछ मदद करू तो बेटा बिना पापा की तरफ देखे बोला आप रहने दो पापा ये सब आपको समझ  नहीं आएगा माँ है न।
अचानक आनंदी के चेहरे पे हलकी सी मुस्कान  तैर   गई  पर आँख के कोने दुबारा भीग गए।  

शुक्रवार, 27 मार्च 2015

Untouched stories: when i was in operation theater mera anubhav

Untouched stories: when i was in operation theater mera anubhav

when i was in operation theater mera anubhav

आज मेरा बेटा तीन साल का होने वाला है  आज भी  जब वो पल याद आते है तो दिल में सिहरन सी होने लगती हे रूह काँप जाती है जब डॉक्टर ने कहा था की अगर कुछ देर में मेरा ऑपरेशन न किया  बच्चे की  मेरी  ख़तरा हो सकता है  आनन फानन में सब तैयारी हो गई  मेरा रो रो के बुरा हाल था मुझे तो सुई लगवाने से भी  डर लगता था।  ऊपर वाले से अपने बच्चे  की सलामती की दुआ मांग रही थी सब मुझे दिलासा दे रहे थे आसपास मौजूद लोग भी अपने अनुभव सुना के मुझे तसल्ली दे रहे थे तो  कोई डॉक्टर और नर्सो को कोसरहे थे।  कोई कोईसास  आजकल की बहुओ के काम ना करने को वजह बता रही थी।  और  वहा मौजूद दाइया  जल्दी काम खत्म कर  घर जाने को बेताब थी।  डॉक्टर ने भी कह दिया की उसकी शिफ्ट दो बजे तक है उसके बाद वो चली जाएगी    अब मुझे अंदर जाने को कहा गया और डॉक्टरने  घरवालो से खून का  करने को बोला।  आखिर मुझे    ऑपरेशन थिएटर में लाया गया घरवालो को बाहर ही  दिया गया में अंदर एकदम अकेली थी दिल में अजीब   अजीब ख्याल  आ रहे थे तभी एक नर्स नेमुझे  स्ट्रेचर पे लेटने को कहा मैं चुपचाप लेट गई फिर एक वार्डबॉय आया उसने कहा की मैं यहाँ क्यों लेट गई मुझे तो अंदर जाना है और वो
नर्स को भलाबुरा कहक
र चला गया अब मैं
 अंदर
आ गई यहाँ एक दूसरी  ने मुझे ऑपरेशन के लिए तैयार किया और आखिरकार मैं ऑपरेशन
टेबल  तक पहुँच गई   बहुत घबरा रही थी   और ऊपरवाले से अपने बच्चे की सलामती की दुआ मांग रही थी और सोच रही थी की अगर मुझे कुछ हो गया तो मेरे बच्चे का क्या होगा
वो पल ज़िन्दगी का सबसे भयानक पल था मुझे
अपनी ज़िन्दगी और मौत दोनों नज़र आ रहे थे।और  डॉक्टर और नर्स आपस  में  बातें कर रहे थे डॉक्टर  काफी थकी  हुई थी वो सुबह से ४-५  ऑपरेशन कर चुकी थी और  उसकी उसकी उम्र के हिसाब से ये काम बहुत ज़्याडा  था डॉक्टर ने मुझसे पूछा की   मैं  क्या सोच  रही  हु  मैंने कहा सब ठीक होगा ना ? फिर वो हलके  से मुस्कुराई   और  मेरे सर पे हाथ  रखा और बोली हां।
फिर मुझे एक सुई चुभने का एहसास हुआ और मेरा बदन सुन  गया पर मेरा दिमाग और कान अभी भी काम  कर रहे थे।  अचानक मुझे  लग रहा था की मेरे बदन पे कई सारा बोझ रखा हो फिर किसी ने पूछा की मैं कुछ महसूस कर रही हु  क्या  ? मेरे  न कहने पर कुछ हल्का सी चुभन का एहसास हुआ  फिर  मुझे आवाज़  आई की डॉक्टर अपने असिस्टेंट को सही समय पर दवा न मंगवाने पर  घुस्सा हो रही थी और वह नर्स  आपस में छुट्टी ना होने की खुन्नस  निकाल  रही थी  मुझे  अचानक  उस   चूहे  की तरह लगा जिसपर प्रयोग किये जाते है डॉक्टर अपने असिस्टेंट को ठीक से काम करने  
 का तरीका सीखा  रही  थी  उनके  लिए  मैं सिर्फ  एक चीज़ थी  तभी  एक हल्का सा एहसास हुआ  और  लगा की मेरा जीवन सफल हो गया  नर्स  ने  हलके से मेरे  कान में कहा  बेटा हुआ है। मैंने  खुदा  का शुक्र अदा किया।
फिर मुझ  पे  पूरी  बेहोशी  छा  गई  जब होश आया तब  अपने फूल से  बच्चे  को  देखकर  सब दर्द  तकलीफ  ख़तम  हो गए।
           


बुधवार, 25 मार्च 2015

Untouched stories: waapsi

Untouched stories: waapsi

waapsi

आज काफी समय  के बाद कुछ लिख  हु पता नहीं  लिख पाऊँगी या नहीं नहीं।  पर कोशिश  करुँगी  की खुद को वापस ढून्ढ पाउ  आप सभी के साथ वापस जुड़ पाऊं। 
अब बच्चा बड़ा हो  अब उसे पुरे वक़्त मेरी ज़रूरत नहीं होती  तो अपने विचार आपके साथ बांटने की  करुँगी 

रविवार, 15 सितंबर 2013

कन्या भ्रूण ह्त्या सही या गलत ?


  कन्या भ्रूण ह्त्या सही या गलत ??????????????


आज भी हमारे देश में लडकियों  होने से पहले ही मार दिया जाता हे सब कहते है की ये गलत है पर आज हमारे देश के जो हालात है दिन ब दिन बड़ते अपराध रेप अपहरण दहेज़ उत्पीडन  और घरेलु हिंसा और इनके चलते होने वाली आत्महत्याओ के मामलो को देख कर कभी मन के किसी कोने में ये ख्याल आता है की अगर पैदा होने के बाद एक नन्ही सी मासूम कलि को यही सब सहना है रोज़ रोज़ मरना है तो  दुनिया में ही क्यों लाये  माँ बाप तो डरेंगे ही की कही उनकी बेटी को भी किसी हादसे का शिकार ना होना पड़े उस पर ये समाज जहा आज भी बेटी को बोझ ही माना जाता है आज भी यही कहा जाता है की बेटी के माँ बाप है तो सर तो नीचा रखना ही पडेगा शर्मिन्दा भी होना पडेगा आखिर समाज में जो रहना है फिर तो यही सच है की बेटी तू दुनिया में आएगी तो मेरा सर और कंधे दोनों झुक जायेंगे इसलिए तू जन्म ना ले यही अच्छा है
सच हम आज भी अपनी मानसिकता को नहीं बदल पाए दुनिया चाँद के आगे निकल गई और हम ज़मीन पर चलना भी नहीं सीख पाते।  हम बात करते है की महिलाओ को हर जगह बराबरी का हक है अरे हम उन्हें साथ खड़ा देख कर बर्दाश्त नहीं कर पाते अगर किसी ऑफिस में लेडीज बॉस हो तो लोग पीठ पीछे मज़ाक उड़ाते है अगर लड़की को तरक्की मिले तो उसके काम को नहीं उसके चरित्र को आंकने लगते है ज़माना किस और जा रहा है कितनी तरक्की कर रहा है इसका सबूत हमारे राजनेता समय समय पे महिला विरोधी बयान देकर देते रहते है जब देश के रहनुमा ही देश की महिलाओ की इज्ज़त नहीं कर पाते तो हम आम नागरिको से क्या उम्मीद करे क्राइम रेट में शहर के पड़े लिखे युवा भी उतने ही  सक्रिय है जितने गाँव के अनपढ और जाहिल लोग फिर किस उन्नति की और बढ़ रहे है हम  आज भी जब कोई क्राइम होता है खूब हंगामा होता है सब युवा भीड़ लगाते है चिल्लाते है नारे लगाते है और फिर अगली गली में जाकर लडकियों पर फब्तिय कसते है
वर्ना क्यों आज इतने प्रचार प्रसार के बाद भी क्राइम रेट में कमी नहीं आ रही क्यों महिलाओ को लेकर हम आज भी घटिया सोच ही रखते है महा नगर हो या गाँव क्यों महिला हर जगह असुरक्षित है क्यों।?????????
तभी तो आज ये सवाल उठा की लडकियों को अगर यही सब सहना है अगर हम उन्हें एक इज्ज़त दार ज़िन्दगी नहीं दे सकते तो हमें क्या हक़ है उनको पैदा करके उन्हें इस नरक में झोंकने का। ………………।

गुरुवार, 12 सितंबर 2013

एक नई कोशिश।

मुकद्दर में किसके क्या लिखा है ये तो ऊपर वाला ही जानता है हम तो सिर्फ कोशिश ही कर सकते है पर जब सब कुछ किस्मत में पहले से ही लिखा है तो कोशिश क्या करे आखिर होना तो वही है जो मुकद्दर में लिखा है हम कोशिश करेंगे अपनी किस्मत बदलने की और जब हार जायेंगे तो कहेंगे की किस्मत का लिखा कोन बदल सकता है हाँ जब भी हम हारते है तो यही तो कहते है की ये तो मरी किस्मत ही खराब है मेने तो पूरी कोशिश की थी पर  सच कई बार हम देखते है की कई लोग जिनको कोई ज्ञान नहीं होता या बिना कोई योग्यता के कई ऊंची पोस्ट पे काम करते है और जो लोग ज्ञान वान है वो उनकी जीहुजूरी करते है कोई सारा दिनमेहनत  करके भी दो रोटी नहीं कमा पाता और कोई बिना कुछ किये ऐश करता है कई सवाल जिनके जवाब हम नहीं ढून्ढ पाते क्यों आखिर क्यों कुछ लोग मिटटी को हाथ लगाये तो वो सोना बन जाती है और कुछ लोग सोने को भी मिटटी में बदल देते है कई बार हम किसी का बुरा नहीं चाहते फिर भी किसी का दिल दुख देते है और कई बार जो हमे बार बार दुःख देते है उनको खुश करने के लिए खुद को भी मिटा देते है कई बार हमे पता होता है की ये रास्ता हमे कभी मंजिल पे नहीं ले जायेगा फिर भी हम उस पर चलते रहते है कभी मंजिल सामने होने पर भी उस तक नहीं पहुँच पाते कभी हम किसी को नहीं समझ पाते तो कभी कोई हमे हर इंसान अपने आप में उलझा हुआ है अपने सवालों के जवाब ढूँढता रहता है सारी ज़िन्दगी यूँही सवालों में कट जाती है क्यूंकि वक्त तो नहीं रुकता हम भले ही रुक जाये
काश कभी ऐसा हो की हम को हमारे सवालों के जवाब मिल जाये जब हम सुबह जागे तो हमको पता हो की आज कुछ बुरा नहीं होगा सब ठीक होगा आज कोई नई उलझन नहीं आएगी पर खैर ये तो पंडित और ज्ञानी भी नहीं बता सकते की अगले पल क्या होने वाला है  तो हम क्या जाने।  इसलिए सब कुछ मुकद्दर पे छोड़ के अपना काम करते रहने में ही भलाई है हम तो सिर्फ कोशिश ही कर सकते है न हर बार एक नई कोशिश।

सोमवार, 19 अगस्त 2013

छोडो कल की बाते कल की बात पुरानी ( नई जनरेशन और नए खेल )



छोडो कल की बाते कल की बात पुरानी
 ( नई जनरेशन और नए खेल ) 
कुछ समय पहले अमिताभ बच्चन ने अपने एक इंटरव्यू में कहा की उनकी डेढ़ साल की पोती अपना IPAD खुद चलाती है जो भी एप्लीकेशन उसे देखना होती है उसको ओपन करती है और रन करती है मेरे घर पर मेरा बेटा जो अभी १ साल और कुछ महीनो का है पूरे टाइम मेरे मोबाइल पर या कंप्यूटर पर पोयम्स और  देखना पसंद करता है उसे   स्क्रीन मोबाइल को   चलाना  आता है रेसिंग  मोटो उसका पसंदीदा गेम है और स्क्रीन पे टच से होने वाले इफ़ेक्ट को वो समझता है और अगर कोई एप्लीकेशन उसे  बंद करनी हो तो वो  काम खुद ही कर लेता है. आज कल बच्चे जिस माहोल में रहते है वो उन्हें बहुत जल्दी तकनीकी समझ दे देता है मोबाइल कंप्यूटर और जाने कितनी नई तकनीक जो हम अब सीख पाए है उनकी जानकारी उन्हें बहुत जल्द हो जाती है आज सावन का आखिरी दिन है पर कही  की तरह सावन  के झूले नज़र नही  ना ही झुण्ड बना कर  चपेटे और गिप्पा खेलती लडकिया नज़र आती है बाजारों में राखियो पर भी डोरेमोन छोटा  भीम आदि ही नज़र आते है सब कुछ जैसे डिजिटल हो गया है पर यही तो  नई पीड़ी है और हमे इस को पूरा सहयोग देना चाहिए क्यूँकी हर सिक्के के दो पहलु होते है अगर आज हमारी पीड़ी आगे बड़ रही है  तभी तो वो कल नए भारत का निर्माण करेगी और हम अपने विचार उन पर  थोप नहीं सकते क्यूंकि आज बच्चो का दिमाग बहुत ज्यादा विकसित होता है क्यूँकी उन्हें संसार को जान्ने के मौके बहुत ज्यादा और बहुत जल्दी मिलते है और इतिहास की कहानिया कितनी लुभावनी क्यों ना हो भविष्य की चमक में खो ही जाती है एक दिन भविष्य को भी इतिहास बनना है तो क्यों ना हम अपनी नई जनरेशन को मौका दे की वो अपना इतिहास खुद बनाए।  बस अपने संस्कार और सभ्यता की विरासत को संभाल कर रखे पर इतिहास की कहानियो में खोकर कही भविष्य के बारे में विचार करना ना छोड़ दे इसीलिए तो कहते है की
छोडो कल की बाते कल की बात पुरानी, नए दौर में लिखेंगे मिलकर नई कहानी



सोमवार, 12 अगस्त 2013

स्वंत्रता दिवस एक विचार

स्वंत्रता दिवस एक विचार
हर साल की तरह इस बार भी १५ अगस्त आ गया और हर साल की तरह इस बार भी १५ अगस्त की छुट्टी होगी हम सब घूमने जायेंगे और घर पर किसी चैनल पर आने वाले देशभक्ति के गानों पर नाचते गाते सेलिब्रिटीज को देख कर खुश होंगे और फिर अपने बाकी बचे हुए काम करके सो जायेंगे यही हमारी आजादी हे क्यूंकि हमे ज़िन्दगी अपने तरीके से जीने की आजादी है क्या मतलब हमे देश से भाई हम आज़ाद है और हमारे लिए आजादी का मतलब सिर्फ अपने हिसाब से जीने से है जहा हमे कोई फिक्र न हो कोई रोक टोक न हो. पर क्या सिर्फ एक दिन हम अपने देश के बारे में नहीं सोच सकते क्या हम इतने खुदगर्ज़ है की हमें कोई फिक्र नहीं की देश के बॉर्डर पर क्या हो रहा है क्या हमें पता है की जम्मू कश्मीर में आज कल क्या हाल है क्या हमें फिक्र की की चारो और पानी ने जो तबाही मचाई है उन लोगो की जो उस तबाही में अपना सब कुछ खो चुके है
शायद नहीं वो सब तो न्यूज़ चैनल पर दीखता है सिर्फ उतनी ही देर याद रहता है और फिर सब भूल जाते है बड़े बड़े आन्दोलन होते है सब जोश से भर जाते है और फिर सब शांत। यहाँ तक की आन्दोलन चलाने वाले भी अपने हितपूर्ति में लग जाते है किसी को देश की फिक्र नहीं सब को अपनी फिक्र है नेता संसद में हंगामा करते है और जनता सडको पर पर बर्बाद तो देश को ही करते है

आखिर हम आज़ाद है हमें अपनी बात कहने का हक है पर अपनी बात कहने के लिए देश को बर्बाद करने का हक़ हमे किसने दिया। संसद भंग कर या पुतले जला कर या निर्दोष जनता को मारकर देश को किस दिशा में ले जाना चाहते है हम घटिया राजनीति और संक्रीन सोच हमारी सबसे बड़ी समस्या है
हम प्राथना करते है की इस बार हम इस सोच से ऊपर उठकर देश के उत्थान के लिए काम करेंगे
अगर हर देशवासी अपने देश के बारे में सोचे  तो हमारा देश सचमुच महान हो जायेगा
ज़रूरी नहीं की हम कोई महान काम करे भीड़ जुटाए पर छोटे छोटे काम भी हमारे देश के विकास में योगदान कर सकते है जैसे अपने आसपास से शुरुआत करे।  किसी ज़रूरतमंद की मदद करे.
नियमो का पालन करे आदि
हम आप सभी भारत वासियो को स्वन्त्रत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाये देते है



रविवार, 11 अगस्त 2013

बिन पानी सब सून और जब पानी करदे सब सून

बिन  पानी सब सून और जब पानी करदे सब सून 

पानी ही पानी

मशहूर  दोहा है की
          " रहिमन  पानी रखिये बिन पानी सब सून "
पर इस  इस  हुआ है की  पानी ही पानी है और पानी ने सब सूना कर दिया    लोग बेघर हुए हजारो बर्बाद
हर जगह सिर्फ पानी ही पानी। और इतना पानी होने के बाद भी पीने के पानी  लोग।  सच है
               "अति सर्वत्र वर्जयेत  "
जब पानी न हो तो पानी ना होने का रोना और जब पानी अपने विशाल रूप में   दर्शन दे तो पानी बंद होने की दुआए मांगते लोग।  पर सच इस बार जितना पानी देखा उतना पहले कभी नहीं देखा हमारे शहर में भी सभी तालाब नदी नाले उफान पे है दुसरे शेहरो से संपर्क कट गया है।  दूध सब्जी और पीने का पानी सबकी किल्लत हो गई है सारे रास्ते पानी में डूबे है और बड़ो के साथ बच्चे भी परेशान है क्यूंकि वो भी खेल नहीं पा रहे है जो पहले स्कूल बंद होने की ख़ुशी मना रहे थे अब दोस्तों की याद करके रो रहे है और तो और ईद की रोनक को भी पानी ने फीका कर दिया क्यूंकि लगातार बरसते पानी की वजह से कोई किसी से मिल ही नहिपाया सब सारे दिन अपने घरो में  पानी बंद होने का इंतज़ार कर रहे थे पर पानी ने तो जैसे बंद ना होने की कसम ही खाई थी बाज़ार की रोनक भी कम रही।  लोग नए कपडे खरीदने से ज्यादा घरो की सीलन और छतो से टपकने वाले पानी को रोकने का सामान खरीदने में बिजी थे।  अब १५ अगस्त आ रहा है हम दुआ करते है की हम पूरे जोश और जूनून से स्वंत्रता दिवस मना पाएंगे।

आमीन

बुधवार, 7 अगस्त 2013

ज़िन्दगी का सफ़र

ज़िन्दगी का सफ़र



कभी वक़्त मिले तो सोचना की हमने अपनी ज़िन्दगी में कितना कुछ  कितना कुछ खोया
कभी किसी ने हमे धोका दिया तो कभी हमने किसी को धोका दिया कभी किसी ने हमसे झूठ बोला तो कभी हमने किसी से
बस ज़िन्दगी ऐसे ही गुज़र गई हम ने सारी ज़िन्दगी दूसरो को  दी पर कभी खुद को समझने की कोशिश नहीं की हम क्या चाहते है हमारी क्या ख्वाहिशे  है  कभी वक़्त ही नहीं मिला  सोचने का  कभी घर वालो की ख़ुशी के लिए तो कभी बच्चो की ख़ुशी के लिए कभी दोस्तों की ख़ुशी के लिए बस करते रहे सब
और फिर भी किसी को भी खुश नहीं कर पाए आज भी हर इंसान को शिकायत है सही है जो इंसान खुद खुश न हो वो दूसरो को खुश   सकता है पर हम जिस समाज में रहते है हमने वह हमेशा यही देखा है की हमारी माँ कभी भी अपनी ख़ुशी नहीं देखती वो सिर्फ बच्चो की ख़ुशी में खुश हो जाती है पापा  पहनते है ताकि बच्चो के नए कपड़ो के लिए पैसे बचा सके  हम भी कहीं ना कहीं उसी परवरिश का एक हिस्सा है ये हमारे संस्कार है जो हम को खुश होने से रोकते है पर हमे अपनों से जोड़ते है और हम दूसरो की ख़ुशी में अपनी ख़ुशी ढूँढने लगते है
और साड़ी ज़िन्दगी दूसरो को खुश करके खुश होते रहते है   यही है ज़िन्दगी का सफ़र
कहते है न
अपने लिए जिए तो क्या जिए 
ये दिल ये जा  के लिए 
 

शनिवार, 22 दिसंबर 2012

intezaar kab tak




इंतज़ार  और कब तक 




आज काफी समय के बाद इस ब्लॉग पर लिखने न मौका मिला। सच है ज़िन्दगी की भाग दौड़ में हम इतने खो जाते ही की खुद के लिए भी समय नहीं निकल पते। हर पल एक नया इंतज़ार।
                                                  सच दुनिया में आना ही एक इंतज़ार है देखिये न दुनिया में आने के लिए नौ महीने तक माँ के गर्भ में इंतज़ार  फिर अपनी छोटी छोटी बातो को समझाने के लिए शब्दों का इंतज़ार फिर कदम राह तलाशने लगते है पर चलने का इंतज़ार और जब कदम चलना शुरू कर दे तो बस हर पल नई मंजिल का इंतज़ार।
                                     मेरा 6 महीने का बीटा रोज़ रात को नाना का इंतज़ार करता है की वो आएंगे तो उसको CHOCOLATE मिलेगी। उसे देख कर में यही सोचती हु की अभी इसका ये छोटा सा इंतज़ार उसकी ख्वाहिशो की एक शुरुआत है। आज ज़माना जिस तेज़ी से भाग रहा है उस तेज़ी से भागने के लिए अभी उसे भी इंतज़ार करना पड़ेगा। हम अपने ख्वावो को अपने बच्चो की आँखों से देखने लगते है जो हम ना कर पाये वो सभी अपने बच्चो को करवाना चाहते है। कभी लगता है की कही न कही हम सभी स्वार्थी हो जाते है।
            बच्चो की मस्सों दुनिया को हम खुद बेरंग कर देते है और अपने आप को एक महान माता-पिता का दर्ज़ा पाकर खुश होते रहते है पर कभी नहीं सोचते की उस मासूम के दिल का क्या हाल है वो तो एक कोर कागज़ है। हम उस पर अपनी ही इबारत लिख देते है। हाँ सभी तो इस पल का इंतज़ार करते है की हमारे बच्चे बड़े हो और हमारे ख्वावो को पूरा करे। खुद मुझे ऐसी तौफीक दे की में अपने को इस लायक बना सकू की मेरा बच्चा अपने सपनो को पूरा कर सके न की पूरा वक़्त मेरे सपनो को पूरा करने में खर्च करे और फिर इंतज़ार करे अपने बच्चो के बड़े होने का।
                                                                          आमीन 

बुधवार, 6 अक्टूबर 2010

इंसान की ख्वाहिशो की कोई इन्तेहा नहीं

इंसान की ख्वाहिशो की कोई इन्तेहा नहीं
दो गज ज़मीन चाहिए दो गज कफ़न के बाद
रोज़ सुबह उठते ही मन में नई ख्वाहिश जागने लगती हे काश ऐसा होता काश वैसा होता सब कुछ तो हे पास मगर फिर भी कोई तो कमी हे काश मेरा घर इतना बड़ा होता की साड़ी कायनात उसमे समा जाती काश मेरे पास इतना पैसा होता की हम चाँद तारे भी खरीद पते पर कहते है न
हजारो ख्वाहिशे ऐसी की हर ख्वाहिश पे दम निकले
बहुत निकले मेरे अरमा मगर फिर भी कम निकले
कितना भी मिलता हे कम ही रहता हे कभी सुकून की दो सांस नसीब नहीं होती हम भागते रहते है हमेशा परछाइयों के पीछे और अपने आप को भी खो देते हे जब होश आता हे तो हातह खली होते हे और दिल परेशा ।
अपनी पहचान बनाते बनाते हम खुद खो जाते है एक ऐसे अँधेरे में जहा कोई रौशनी की किरण नज़र नहीं आती
पर फिर भी हमारी ख्वाहिशे ख़तम नहीं होती । हमेशा बेहतर और बेहतर पाने की ख्वाहिश हमे अपनों से दूर कर देती है हम भूल जाते है की हम क्यों और किसकी ख्वाहिशो के पीछे भाग रहे थे । इसलिए तो आँखे बंद कर ख्वाहिशो के पीछे भागने की वजाय जाने की आखिर हम क्या चाहते है और हमारी ज़रूरत कितनी है
मालिक इतना दीजिये जा में कुटुम समाये
में भी भूका न रहू साधू न भूका जाये

बुधवार, 29 सितंबर 2010

नज़रे बदल गई या मोसम बदल गए

आजकल मोसम कुछ बदला बदला सा लग रहा हे गर्मी ख़तम हो रही हे, पर आजकल फिज़ाओ में अजीब सी घुटन फ़ैल रही हे सब के मन में डरहै कल पता नहीं क्या हो जाये कोई नहीं चाहता की किसी भी तरह से देश की शांति भंग हो फिर क्यों मोसम इतना नीरस हे आखिर अचानक क्या हो गया की सदा एक दुसरे का हाथ पकड़ कर चलने वाले लोग भी एक दुसरे को देखकर नज़रे फेर रहे है । अचानक धर्म दोस्ती से बड़ा कैसे हो गया । क्या इतने सालो की वो मेल मुलाक़ात दिखावा थी क्या सरे सुख दुःख जो साथ में बांटे वो दिखावा था । वो चाय की दूकान में एक ही कप से चाय पीना वो साथ में घूमना वो बाते सब दिखावा था वो दिवाली पे साथ पठाके चलाना और यिद पे सिवैये खाने के लिए जाना सब झूठ था । सब दिखावा था । एक छोटी सी सी ठसक से टूट गई वो मज़बूत दीवार जो इतने सालो तक मिलकर उठाई थी और सब अपने बेगाने हो गए। दोस्त दोस्त न रहकर हिन्दू मुसलमान हो गए । देश में गरीबी हे लोगो के पास पहनने को कपडे नहीं शिक्षा नहीं आतंकवाद जैसे कितने ज्वलंत मुद्दे हे इतनी समस्याओ के बीच ये नई उलझन कहा से आ गई । अपना घर तो बना नहीं पाते इस कलयुग में और हमारे धर्म के ठेकेदार हमे भगवान् के घर बनाने को उकसा रहे हे । अगर अस्पताल बने तो कम से कम वह गरीबो का इलाज हो पर इस तरह के काम में हम कभी आगे नहीं आयेंगे कभी किसी स्कूल या अनाथालय को दान देना हो तो जेब में पैसे नहीं होते पर आस्था के नाम पर हज़ारो लुटा देंगे। अरे भगवान् या खुदा भी ऐसे घर में कैसे रहना
पसंद करेंगे जिसकी नीव उसके बन्दों की लाश पे राखी गई हो ।
ज़िन्दगी एकबार मिलती हे जैसे आपकी जान कीमती हे सब की जान कीमती हे कोई भी धर्म हिंसा का पाठ नहीं पदाते फिर क्यों हम कुछ मतलबी लोगो की बातो में आकर अपने आपको इस कभी न बुझने वाली आग में झोंक देते हे ।
इस संसार को शान्ति का पैगाम देने के लिए सबका सहयोग आवश्यक हे ।

नज़रे बदल गई या मोसम बदल gaye

Dream is not what you see in sleep . It is something that does not let you sleep.

गुरुवार, 15 अप्रैल 2010

न्याय के लिए अन्याय की जंग

एक बहुत पुरानी कहावत है जब जब धरती पर पाप बढता है तो उसका दमन करने के लिए कोई अवतार जन्म लेता है जो पापियों का नाश करता है और मज़लूमो को उनका हक दिलाता है। पर ये कलयुग है यहाँ पाप तो लगातार बढ रहा है पर किसी अवतार का कोई अता पता नहीं शायद ये भी कोई दादी की पारी कथा ही होगी वरना भगवान् इतना निर्दयी कैसे हो सकता है की ज़ुल्म का घडा सर से ऊपर जाकर बहे और कोई अवतार ना आये । हाँ कुछ लोग ज़रूर खुद को हीरो समझ कर खुद ही ज़ुल्म का नाश करने निकल पड़ते है पर ज़ुल्म तो वही का वही रहता है पर उनकी इस महानता की सज़ा उन लोगो को मिलती है जो पहले से ही सज़ा भुगत रहे है इस देश का एक आम नागरिक होने की । ऐसे ही कुछ विकृत मानसिकता के लोग है जो खुद को देश का हितेषी मानते है और नक्सल वाद को जन्म देते है। आखिर ये क्या करना चाहते है कोण सा समाज सुधारना चाहते है क्या बदलाव लाना चाहते है । ये सच हे की नक्सलवाद का जन्म आक्रोश की आंधी से ही हुआ है जब पाप बढता है तो आक्रोश जागता है और जब आक्रोश जागता है तो उसका हल धुंडने का समय किसी के पास नही होता उस वक़्त सही गलत समझ नहीं आता । लेकिन जब आप स्वयं ही अपना घर उजाड़ने पर टूल जाए तो ये कोनसा सुधार है । लोगो की जान लेने का हक तो किसी को नहीं है फिर आप कोन होते है किसी को सजा देने वाले । अगर सिस्टम से परेशानी है तो उसको बदलने की कोशिश कीजिये नाकि उसको समाप्त करने की परआज किस के पास वक़्त हा ये सब सोचने का हम परेशान है तो उठाओ बन्दूक और मार दो सामने वाले को ट्रेन रोक दो बम चलाओ जब तक धमाका नहीं होगा तो कोई नहीं सुनेगा यही मानसिकता हो गई हे लोगो की पर कभी कोई नहीं सोचता की उस धमाके में जो लोग मरे उनके परिवार वालोने आप का क्या बिगाड़ा था वो तो खुद आप में से ही एक थे अरे जिन्होंने ये सिस्टम बनाया आप तो उनको राजनीती करने के लिए और मौके ही दे रहे है जब कभी कोई ब्लास्ट होता है खूब भाषण होते है अगले चुनाव तक सभी राजनीतिक दल उस पर अपनी दाल रोटी सकते है। फिर सब ख़तम । सब यहाँ का यहाँ क्या परिवर्तन आया कुछ नहीं ना सिस्टम में ना आपमें परिवर्तन तो सिर्फ उस घर में आया होगा जिसने उस जगह अपनी जान दी चाहे वो पुलिस वाले हो या आम आदमी या नक्सली । सब कहते है सरकार कोई कदम नहीं उठाती जब जो पार्टी सत्ता में होती है उस पर दोष धर दिया जाता है की वो असफल है इस्तीफा दो आदि पर इस समस्या का समाधान इस्तीफे मांगने और सता बदलने से होना होता तो कबका हो चूका होता अरे पहले समस्या को समझिये तो फिर उसको जड़ से मिटाने की कोशिश कीजिये । समाज को शिक्षित बनाइये की वो अपना भला बुरा खुद सोच सके । उन्हें ज़ुल्म और अत्याचार और अपने हक की लड़ाई में फर्क पता तो चले क्यूँकी उन्हें तो ये भी नहीं पता की जो वो कर रहे है वो उनके हक की नहीं जुलम की लड़ाई है। सबसे पहले खुद को बदलो फिर समाज को बदलो क्यूंकि हम समाज से नहीं समाज हमसे बनता है । यही इस समस्या का सही निदान हो सकता है।

मंगलवार, 23 मार्च 2010

एक कड़वा सच .......... ग्लोबल वार्मिंग

उफ़ ... ये गरमी , आग उगलता सूरज रोज़ बढता पारा और मुश्किल होता जीना घर से बाहर जाए तो जाए कैसे । अभी कुछ दिन पहले की ही तो बात थी जब कडकडाती ठण्ड ने हमे घर के अन्दर बंद होने पर मजबूर कर दिया था । हम रोज़ दुआए मांगते की कब ये सर्दी ख़तम होगी पर किसको अंदाजा था की सर्दी के वीभत्स रूप को देखने के बाद हमे गरमी का भी विकराल रूप देखना पडेगा। आज कल मौसम भी सचिन तेंदुलकर की तरह रिकॉर्ड तोड़ने में लगा है। कही १०० साल की सर्दी का रिकॉर्ड टूटा तो कही गरमी का। लगता है मनुष्य के पापो का घड़ा भर चूका है। और अब प्रकर्ति भी उसे सज़ा देने पर आमादा हो गई है। आखिर इतने वर्षो तक मनुष्य ने भी तो उसके साथ अन्याय किया है उसी का परिणाम है ये ग्लोबल वार्मिंग । ग्लोबल वार्मिंग का मुख्या कारण है ग्रीन हाऊस गैसे
जो की अवरक्त किरणों के रूप में प्रथ्वी के तापमान को बढाने के लिए उत्तरदायी है। इसका मुख्य अवयव है कार्बोन डाई ओक्सईड, मीथेन , नाइट्रस ओक्सईड , जल भाप आदि है। इन गैसों के सबसे बड़े निर्माताओं में ताप विद्युत संयंत्र है , जो जीवाश्म ईंधन को जलाने और बड़ी मात्रा में इन गैसों का उत्पादन कर रहे हैं. इन ग्रीन हाउस गैसों का दूसरा सबसे बड़ा स्रोत सड़क पर चलने वाहन और अन्य उद्योगों से हैं। इस बड़ते तापमान का ही नतीजा है की ध्रुवो पर बर्फ पिघल रहा है अगर यही हाल रहा तो डर है की किनारों पर स्तिथ देश जल्दी ही सागर में समा जायेंगे। ग्लोबल वार्मिंग ने जानवरों के साम्राज्य को भी प्रवाभित करना प्रारंभ कर दिया है कई प्रजातीय जो इस बदलते मौसम की मार सह सकने में अक्षम है लुप्त होती जा रही है। इस ग्लोबल वार्मिंग का ही प्रणाम हमे मौसम चक्र के बिगड़े रूप में नज़र आ रहा है अब गर्मिया सर्दियों से अधिक लम्बी होती है ।बारिश का कोई समय पक्का नहीं है। बारिश में सूखा पड़ता है और सर्दी या गरमी के मौसम में बारिश तबाही मचा देती है। बड़ते तापमा ने कई नई बीमारियों को भी जन्म दे दिया है। इसका कारण यह है की बेक्टेरिया सर्दी की अपेक्षा गर्मी में तीव्रता से बड़ते है । आज किसान हमेशा डरे रहते है की पता नहीं कब इस बदलते मौसम की मार से उनकी फसल बर्बाद हो जाए। इस तरह कोई भी ऐसा क्षेत्र नहीं है जो इस ग्लोबल वार्मिंग से परेशान न हो । पर अब सोचने और बाते करने या चिंता जताने से काम नहीं चलेगा क्यूँकी अगर वक़्त रहते इस समस्या को सम्भाला नहीं गया तो एक क़यामत आने से कोई नहीं रोक पायेगा और उस क़यामत के ज़िम्मेदार हम स्वयं ही होंगे ।