बुधवार, 29 सितंबर 2010

नज़रे बदल गई या मोसम बदल गए

आजकल मोसम कुछ बदला बदला सा लग रहा हे गर्मी ख़तम हो रही हे, पर आजकल फिज़ाओ में अजीब सी घुटन फ़ैल रही हे सब के मन में डरहै कल पता नहीं क्या हो जाये कोई नहीं चाहता की किसी भी तरह से देश की शांति भंग हो फिर क्यों मोसम इतना नीरस हे आखिर अचानक क्या हो गया की सदा एक दुसरे का हाथ पकड़ कर चलने वाले लोग भी एक दुसरे को देखकर नज़रे फेर रहे है । अचानक धर्म दोस्ती से बड़ा कैसे हो गया । क्या इतने सालो की वो मेल मुलाक़ात दिखावा थी क्या सरे सुख दुःख जो साथ में बांटे वो दिखावा था । वो चाय की दूकान में एक ही कप से चाय पीना वो साथ में घूमना वो बाते सब दिखावा था वो दिवाली पे साथ पठाके चलाना और यिद पे सिवैये खाने के लिए जाना सब झूठ था । सब दिखावा था । एक छोटी सी सी ठसक से टूट गई वो मज़बूत दीवार जो इतने सालो तक मिलकर उठाई थी और सब अपने बेगाने हो गए। दोस्त दोस्त न रहकर हिन्दू मुसलमान हो गए । देश में गरीबी हे लोगो के पास पहनने को कपडे नहीं शिक्षा नहीं आतंकवाद जैसे कितने ज्वलंत मुद्दे हे इतनी समस्याओ के बीच ये नई उलझन कहा से आ गई । अपना घर तो बना नहीं पाते इस कलयुग में और हमारे धर्म के ठेकेदार हमे भगवान् के घर बनाने को उकसा रहे हे । अगर अस्पताल बने तो कम से कम वह गरीबो का इलाज हो पर इस तरह के काम में हम कभी आगे नहीं आयेंगे कभी किसी स्कूल या अनाथालय को दान देना हो तो जेब में पैसे नहीं होते पर आस्था के नाम पर हज़ारो लुटा देंगे। अरे भगवान् या खुदा भी ऐसे घर में कैसे रहना
पसंद करेंगे जिसकी नीव उसके बन्दों की लाश पे राखी गई हो ।
ज़िन्दगी एकबार मिलती हे जैसे आपकी जान कीमती हे सब की जान कीमती हे कोई भी धर्म हिंसा का पाठ नहीं पदाते फिर क्यों हम कुछ मतलबी लोगो की बातो में आकर अपने आपको इस कभी न बुझने वाली आग में झोंक देते हे ।
इस संसार को शान्ति का पैगाम देने के लिए सबका सहयोग आवश्यक हे ।
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