शनिवार, 22 दिसंबर 2012

intezaar kab tak




इंतज़ार  और कब तक 




आज काफी समय के बाद इस ब्लॉग पर लिखने न मौका मिला। सच है ज़िन्दगी की भाग दौड़ में हम इतने खो जाते ही की खुद के लिए भी समय नहीं निकल पते। हर पल एक नया इंतज़ार।
                                                  सच दुनिया में आना ही एक इंतज़ार है देखिये न दुनिया में आने के लिए नौ महीने तक माँ के गर्भ में इंतज़ार  फिर अपनी छोटी छोटी बातो को समझाने के लिए शब्दों का इंतज़ार फिर कदम राह तलाशने लगते है पर चलने का इंतज़ार और जब कदम चलना शुरू कर दे तो बस हर पल नई मंजिल का इंतज़ार।
                                     मेरा 6 महीने का बीटा रोज़ रात को नाना का इंतज़ार करता है की वो आएंगे तो उसको CHOCOLATE मिलेगी। उसे देख कर में यही सोचती हु की अभी इसका ये छोटा सा इंतज़ार उसकी ख्वाहिशो की एक शुरुआत है। आज ज़माना जिस तेज़ी से भाग रहा है उस तेज़ी से भागने के लिए अभी उसे भी इंतज़ार करना पड़ेगा। हम अपने ख्वावो को अपने बच्चो की आँखों से देखने लगते है जो हम ना कर पाये वो सभी अपने बच्चो को करवाना चाहते है। कभी लगता है की कही न कही हम सभी स्वार्थी हो जाते है।
            बच्चो की मस्सों दुनिया को हम खुद बेरंग कर देते है और अपने आप को एक महान माता-पिता का दर्ज़ा पाकर खुश होते रहते है पर कभी नहीं सोचते की उस मासूम के दिल का क्या हाल है वो तो एक कोर कागज़ है। हम उस पर अपनी ही इबारत लिख देते है। हाँ सभी तो इस पल का इंतज़ार करते है की हमारे बच्चे बड़े हो और हमारे ख्वावो को पूरा करे। खुद मुझे ऐसी तौफीक दे की में अपने को इस लायक बना सकू की मेरा बच्चा अपने सपनो को पूरा कर सके न की पूरा वक़्त मेरे सपनो को पूरा करने में खर्च करे और फिर इंतज़ार करे अपने बच्चो के बड़े होने का।
                                                                          आमीन 
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