गुरुवार, 15 अप्रैल 2010
न्याय के लिए अन्याय की जंग
मंगलवार, 23 मार्च 2010
एक कड़वा सच .......... ग्लोबल वार्मिंग
जो की अवरक्त किरणों के रूप में प्रथ्वी के तापमान को बढाने के लिए उत्तरदायी है। इसका मुख्य अवयव है कार्बोन डाई ओक्सईड, मीथेन , नाइट्रस ओक्सईड , जल भाप आदि है। इन गैसों के सबसे बड़े निर्माताओं में ताप विद्युत संयंत्र है , जो जीवाश्म ईंधन को जलाने और बड़ी मात्रा में इन गैसों का उत्पादन कर रहे हैं. इन ग्रीन हाउस गैसों का दूसरा सबसे बड़ा स्रोत सड़क पर चलने वाहन और अन्य उद्योगों से हैं।
इस बड़ते तापमान का ही नतीजा है की ध्रुवो पर बर्फ पिघल रहा है अगर यही हाल रहा तो डर है की किनारों पर स्तिथ देश जल्दी ही सागर में समा जायेंगे। ग्लोबल वार्मिंग ने जानवरों के साम्राज्य को भी प्रवाभित करना प्रारंभ कर दिया है कई प्रजातीय जो इस बदलते मौसम की मार सह सकने में अक्षम है लुप्त होती जा रही है। इस ग्लोबल वार्मिंग का ही प्रणाम हमे मौसम चक्र के बिगड़े रूप में नज़र आ रहा है अब गर्मिया सर्दियों से अधिक लम्बी होती है ।बारिश का कोई समय पक्का नहीं है। बारिश में सूखा पड़ता है और सर्दी या गरमी के मौसम में बारिश तबाही मचा देती है। बड़ते तापमा ने कई नई बीमारियों को भी जन्म दे दिया है। इसका कारण यह है की बेक्टेरिया सर्दी की अपेक्षा गर्मी में तीव्रता से बड़ते है । आज किसान हमेशा डरे रहते है की पता नहीं कब इस बदलते मौसम की मार से उनकी फसल बर्बाद हो जाए। इस तरह कोई भी ऐसा क्षेत्र नहीं है जो इस ग्लोबल वार्मिंग से परेशान न हो । पर अब सोचने और बाते करने या चिंता जताने से काम नहीं चलेगा क्यूँकी अगर वक़्त रहते इस समस्या को सम्भाला नहीं गया तो एक क़यामत आने से कोई नहीं रोक पायेगा और उस क़यामत के ज़िम्मेदार हम स्वयं ही होंगे ।रविवार, 21 मार्च 2010
महिला आरक्षण लोलीपोप या बैसाखी
के दलदल में धकेल दिया जायेगा। समाज का एक तबका ऐसा भी है जिसे यह लगताअ है की ये आरक्षण बैसाखियों की तरह है क्यूंकि आज की महिलाए किसी से कम नहीं उन्हें इस तरह के प्रलोभनों की ज़रूरत नहीं । ये वो तबका हे जो शिक्षित है और जानता है की उन्हें क्या करना है। क्यूँकी राजनीति में आने से पहले ज़रुरी है समाज का ज्ञान । अपना सही गलत समझने की शक्ती। अगर महिलाए को ज्ञान नहीं होगा तो ये तो निश्चित है की उन्हें दुसरे के कहे अनुसार ही चलना होगा और अगर उनमे क्षमता है तो फिर उन्हें आगे बदने से कोई नहीं रोक सकता। कुल मिला कर हम कह सकते है की महिला सशतीकरण के लिए जो कार्य सरकार कर रही है वो सराहनीय है अब बारी हमारी है की महिलाओं को जागरूक बनाया जाये ताकि वो अपने अधिकारों को जाने और कोई भी उनका फायदा ना उठा पाए।
गुरुवार, 18 मार्च 2010
चंदेरी एक अहसास
पर देख सकते है। वैसे यहाँ आकर ही यहाँ की संस्कृत और सभ्यता को समझा जा सकता है । में आप सभी को अपने शहर आने का निमंत्रण देती हूँ । यहाँ आने का सही वक़्त अक्टूबर से लेकर मार्च तक रहता है । वैसे बारिश में भी ये जगह अद्भुत खुबसूरत नज़र आती है । पहाडो से गिरते झरने और उनकी कल कल करती आवाज़ मन मोह लेती है। चारो तरफ फैली हरियाली आपको अपनी और खींच लेती है। यहाँ आकर आप हिदुस्तान को करीब से जान सकते है क्यूंकि यहाँ कठिन हालत में भी आपको मुस्कुराते चेहरे मिल जायेंगे । सारा दिन बुनाई का काम करते है और रात को गली के नुक्कड़ पर बैठ कर बड़े बड़े मसलो को हंसी में उड़ाते लोग मिल जायेंगे। ऐसे लोग जिनकी बनाई गई साड़ियो की कीमत उनकी ज़िन्दगी भर की कमाई से भी ज्यादा होती है। उनको तो पता भी नहीं होता की उनकी बनाई गई साड़ी की कीमत उस शो रूम में जाकर क्या होगी जिसके अन्दर जाने की वो हिम्मत भी नहीं कर सकते । वैसे हमारे शहर में सभी के पास काम है । सभी के पास कम से काएक हुनर तो है जो उन्हें उम्मीद दिलाता है की उनके बच्चे कभी भूके नहीं सोयेंगे यही सबसे बड़ी वजह है की वो ज्यादा की ख्वाहिश नहीं करते वो सुखी है की उनके बच्चो को दो वक़्त की रोटी तो नसीब हो रही है। पर क्या सिर्फ यही है ज़िन्दगी जीने का सही ढंग । पर यहाँ के सेठ लोग जानते है की जिस दिन इन मजदूरों को उनके अधिकारों का ज्ञान हो गया उस दिन उनकी दूकान बंद हो जायेगी। वो कभी नहीं चाहते की ये लोग आगे बड़े। पर ये प्रयास हम सभी को करना चाहिए । हम सब की छोटी से छोटी कोशिश भी बेकार नहीं जायेगी। आज के बाद जब कभी भी चंदेरी सिल्क की साड़ी देखे तो एक बार उस कारीगर के बारे में ज़रूर सोचे जिसने दिन रात खुद की जला कर उस साड़ी को बनाया होगा। बाक़ी बाते अगली बार अभी बहुत कुछ है बताने के लिए.....................
बुधवार, 17 मार्च 2010
कुछ अनकही सी बाते
मंगलवार, 16 मार्च 2010
चंदेरी एक छोटी सी दुनिया
ख्वाब तो सभी देखते है कुछ ख्वाब सच होते है और कुछ भूल जाते है । अगर आप सच्चे दिल से कोई चीज़ की ख्वाहिश करो तो कहते है की वो चीज़ खुद आप तक पहुचने के रास्ते तलाश कर लेती है, पर कई बार हम खुद नहीं समझ पाते की सच क्या है और झूट क्या हम बस ख्वाबो की झूटी दुनिया में ही जीते रहते है जहाँ हर चीज़ खुबसूरत होती है परन्तु ज़िन्दगी कोई ख्वाब नहीं । अक्सर जब हमारे साथ कुछ बुरा होता है तो हम सोचते है की ऐसा हमारे साथ ही क्यों हुआ पर जब हम खुश होते हाई तो कभी ये ख्याल नहीं आता। इंसान बहुत खुदगर्ज़ होता है हमेशा अपने बारे में ही सोचता है पर क्या ऐसा नहीं हो सकता की हम केवल अपने बारे में ना सोचकर सब के बारे में सोचे तो ये ज़िन्दगी सचमुच एक खुबसूरत ख्वाब बन जायेगी।
सोमवार, 15 मार्च 2010
रविवार, 14 मार्च 2010
कुछ ख़ास
धुंदली सी कही खोई खोई सी अपनी हस्ती है ।
ना छूना है चाँद न छूना है आफताब ,
जाना है उस मुकाम पे जहाँ किस्मत संवारती है ।
ऐसे रहा करो की करे लोग आरजू
ऐसा चलन चलो की ज़माना मिसाल दे।
किसी ख्वाब से कम ना थी जुस्तजू अपनी
एक बेवफा जहाँ में वफ़ा खोजते रहे ।
वो जिसको हम जान बैठे थे हमराज अपना
उसने तो हमको एक फ़साना बना दिया ।
झुकी झुकी पलकों में हज़ारो ख्वाब रवा होते है ,
बंद लफ्जों से भी अफ़साने बया होते है,
दिल से महसूस करने की ज़रूरत है बस
खुद जान जाओगे परवाने क्यों फना होते है।
शनिवार, 13 मार्च 2010
ज़िन्दगी कितनी अजीब है
कभी कभी मैसोचती हूँ की मेने कभी अपनी मर्ज़ी से कोई डिसीज़न नहीं लिया हमेशा कोई न कोई मुझे रोक देता है कभी तो खुद ही हिम्मत नहीं पड़ती पता नहीं शायद यही ज़िन्दगी है हम अपने लिए नहीं दूसरो के लिए जीते है पर हम को क्या अपनी ज़िन्दगी पर कोई हक नहीं होना चाहिए यहाँ तक की ज़िन्दगी का सबसे ख़ास फैसला भी घरवालो की मर्ज़ी से ही लेते है पर क्या हमको ये जानने का हक नहीं होना चाहिए की हमको जिस इंसान के साथ ज़िन्दगी गुजारनी हे वो क्या इस लायक है या नहीं क्या वो हमे समझ पायेगा शायद यही ज़िन्दगी है हर मोड़ पर एक नया इम्तिहान होता है हर मोड़ पर नई मंजिल होती है हमको बस चलते जाना होता है बाक़ी सब खुदा पर छोड़ देना चाहिए वो जो भी फैसला लेगा उसमे ज़रूर उसकी मर्जी होगी बस हर हाल में जीने की आदत होना चाहिए और खुद पर यकीन यही ज़िन्दगी जीने का सही रास्ता है ।
शुक्रवार, 12 मार्च 2010
सिंधिया जी का आगमन हमारे ऑफिस में
गुरुवार, 5 जून 2008
ज़िंदगी भी अजीब हे
बुधवार, 4 जून 2008
पहली दोस्ती
हलकी हलकी बारिश हो रही थी मेरे पापा मेरा हाथ पकड़कर मुझे विद्यालय ले जा रहे थे और मै रो रही थी मुझे विद्यालय जन पसंद नही था इसलिए खूब आंसू बहाए पर पापा नही माने और मुझे आख़िर जाना ही पड़ा। कक्षा के बाहर खड़े होकर मेने अन्दर जाने से मना कर दिया टैब पापा को गुस्सा आ गया वो मेरे को डांटने लगे तभी हमारे सर बाहर आ गए और मुझे रोता देखकर एक लड़की को बुलाया और कहा की इस बच्ची को अन्दर ले चलो वो लड़की मेरा हाथ पकड़ कर मुझे अन्दर ले गई और बोलीं आज से हम दोस्त हे वो मेरी सबसे पहली दोस्त थी और सबसे प्यारी भी जिससे मेरी दोस्ती आज भी कायम हे उसका नाम स्मिता हे । और वो हमारी मुलाक़ात का पहला दिन जो हम सारी ज़िंदगी नही भूल सकते। उसके बाद न जाने कितने दोस्त आए और गए पर वो दोस्ती वो अपनापन मै कभी नही भूल सकती। ज़िंदगी भर उस दिन को अपनी यादो मै रखूंगी।
बस अब अगली बार