रविवार, 21 मार्च 2010

महिला आरक्षण लोलीपोप या बैसाखी

सभी महिलाए आजकल बड़ी खुश नज़र आती है की बर्षो से चल रही जंग आखिर कार सफल हो गई और देश की आधी आबादी अब संसद में भी बराबरी से नज़र आएगी। सभी पार्टियों ने खुल के इसका स्वागत भी किया । चलिए आखिरकार दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में महिलाओ कोबराबरी का हक दे ही दिया ये दुनिया के लिए एक मिसाल है। पर कही ये आरक्षण सिर्फ दूर के ढोल सुहावने की तरह न हो जाए । क्यूंकि इस पुरुष प्रधान समाज को येबात कटाई गवारा नहीं होगी की किचेन में रोटी बनाने वाले हाथ संसद बड़ी बड़ी बहस करते नज़र आये । वैसे भी माना जाता रहा है की महिलाए केवल घर को ही सही ढंग से चला सकती है राजनीती उनके बस की बात नहीं है ।इसका उदाहरण तो हम आजकी राजनेतिक पार्टियों में देख ही सकते है आज कितनी पार्टियों में महिलाए किसी मुख्य पद पर है। सिर्फ कुछ उदहारण छोड़ दे तो सभी महिलाए उस पार्टी के लिए शोपीस की तरह नज़र आती है। इस माहोल में ये बिल पास होना इस बात का सबूत है की अब पुरुष भी महिलाओ का अस्तित्व नकार नहीं सकते। पर मुझे चिंता इस बात की है की कहीं हर बार की तरह ये आरक्षण भी बस लोलीपोप की तरह ना बन जाए । मतलब कही ये ना हो की चुनाव तो लड़े श्रीमती जी और निर्णय ले श्रीमान जी।जैसा अभी तक होता आया है, आज कई गाँव में महिला सरपंच तो है पर उनका काम बस राष्टीय पर्वो पे झंडा फेह्राने और कागजों पे दस्तखत करने से ज्यादा नहीं है। सारा कामकाज उनके पुरुष पालक ही करते है। अगर अभी भी यही हुआ तो ये आरक्षण महिलाओं की हालत सुधारने के बदले और बेकार कर देगा क्यूंकि तब उन्हें ना चाहते हुए भी ज़बरदस्ती राजनीति
के दलदल में धकेल दिया जायेगा। समाज का एक तबका ऐसा भी है जिसे यह लगताअ है की ये आरक्षण बैसाखियों की तरह है क्यूंकि आज की महिलाए किसी से कम नहीं उन्हें इस तरह के प्रलोभनों की ज़रूरत नहीं । ये वो तबका हे जो शिक्षित है और जानता है की उन्हें क्या करना है। क्यूँकी राजनीति में आने से पहले ज़रुरी है समाज का ज्ञान । अपना सही गलत समझने की शक्ती। अगर महिलाए को ज्ञान नहीं होगा तो ये तो निश्चित है की उन्हें दुसरे के कहे अनुसार ही चलना होगा और अगर उनमे क्षमता है तो फिर उन्हें आगे बदने से कोई नहीं रोक सकता। कुल मिला कर हम कह सकते है की महिला सशतीकरण के लिए जो कार्य सरकार कर रही है वो सराहनीय है अब बारी हमारी है की महिलाओं को जागरूक बनाया जाये ताकि वो अपने अधिकारों को जाने और कोई भी उनका फायदा ना उठा पाए।
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