रविवार, 14 मार्च 2010

कुछ ख़ास

ख्वाहिशो के रास्तो में ख्वाबो की एक बस्ती है ,
धुंदली सी कही खोई खोई सी अपनी हस्ती है ।
ना छूना है चाँद न छूना है आफताब ,
जाना है उस मुकाम पे जहाँ किस्मत संवारती है ।

ऐसे रहा करो की करे लोग आरजू
ऐसा चलन चलो की ज़माना मिसाल दे।

किसी ख्वाब से कम ना थी जुस्तजू अपनी
एक बेवफा जहाँ में वफ़ा खोजते रहे ।

वो जिसको हम जान बैठे थे हमराज अपना
उसने तो हमको एक फ़साना बना दिया ।

झुकी झुकी पलकों में हज़ारो ख्वाब रवा होते है ,
बंद लफ्जों से भी अफ़साने बया होते है,
दिल से महसूस करने की ज़रूरत है बस
खुद जान जाओगे परवाने क्यों फना होते है।
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